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Blogs on Culture And People

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14-Dec-2017

पहाड़ों के टूर का अगर है मन, तो इन पहाड़ी खान-पान का लें मजा

उत्तराखंड मुख्यत: दो रीजन में है। एक गढ़वाल और दूसरा कुमाऊं। आज हम आपको उत्तराखंड के कुमाऊं रीजन के खान-पान के बारे में बताने जा रहे हैं। कुमाऊं रीजन का खान-पान वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर उतना मशहूर नहीं है लेकिन अगर आप कुमाऊं के सैर-सपाटे में जाने का मन बना रहे हैं तो इन पहाड़ी खान-पान का लुत्फ लेना न भूलें। आप अगर एक बार पहाड़ी खानें को खाएं तो यकीन मानिए आपको इसकी खूबी का स्वयं अहसास होगा। आलू के गुटके (कुमाऊंनी स्नैक्स) आलू के गुटके केवल और केवल कुमाऊंनी स्नैक्स हैं। उबले हुए आलू को इस तरह से पकाया जाता है कि आलू का हर टुकड़ा अलग दिखे। इसमें पानी का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता। यह मसालेदार होता है। लाल भुनी हुई मिर्च व धनिए के पत्तों के साथ इसे परोसा जाता है। आलू के गुटके के स्वाद को बढ़ाने में ‘जखिया’ (एक प्रकार का तड़का) का प्रयोग किया जाता है। भांग की चटनी या तिल की चटनी (स्नैक्स या खाने के साथ में) भांग और तिल की चटनी को खट्टी बनाया जाता है और इन्हें कई तरह के स्नैक्स और रोटी के साथ खाया जाता है। भांग की चटनी हो या तिल की चटनी इसके लिए इनके दानों को पहले गर्म तवे या कढ़ाई में भूना जाता है। इसके बाद इन्हें सील (आजकल मिक्सी) में पीसा जाता है। इसमें जीरा पावडर, धनिया, नमक और मिर्च स्वादानुसार डालकर अच्छे से सभी को सील में पीस लिया जाता है। बाद में नींबू का रस डालकर इसे आलू के गुटके या अन्य स्नैक्स व रोटी आदि के साथ परोसा जाता है। अगर आप भांग का नाम सुनकर चिंतित हैं तो परेशान ना हों, इसके दानों में नशा नहीं होता है और इनका स्वाद आलौकिक होता है। कुमाऊंनी रायता (स्नैक्स या लंच के साथ) कुमाऊं का रायता देश के और रायतों से काफी अलग होता है। इसमें बड़ी मात्रा में ककड़ी (खीरा), सरसों के दाने, हरी मिर्च, हल्दी पाउडर और धनिए का इस्तेमाल होता है। इस रायते की खास बात छनी हुई छाज होती है। रायता बनाने के लिए छाज (प्लेन लस्सी) को एक कपड़े के थैले में भरकर किसी ऊंची जगह पर टांग दिया जाता है। कपड़े में से सारा पानी धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है, जबकि छाज की क्रीम थैले में ही रह जाती है। दही की जगह इसी क्रीम का इस्तेमाल कुमाऊंगी रायता बनाने में होता है, जिससे यह काफी गाढ़ा होता है। रायते को लंच के साथ या आलू के गुटके साथ स्नैक्स के रूप में भी खाया जाता है। मडुए की रोटी (स्थानीय अनाज की स्वास्थ्यवर्धक रोटी) मडुए की रोटी मडुए के आटे से बनती है। यह एक स्थानीय अनाज है और इसमें बहुत ज्यादा फाइबर होता है। स्वादिष्ट होने के साथ ही यह स्वास्थ्यवर्धक भी होती है। मडुए की रोटी भुरे रंग की बनती है। मडुए का दाना गहरे लाल या भुरे रंग का होता है और यह सरसों के दाने से भी छोटा होता है। मडुए की रोटी को घी, दूध या भांग व तिल की चटनी के साथ भी खाया जाता है। कई बार पूरी तरह से मडुए की रोटी के अलावा इसे गेंहू की रोटी के अंदर भरकर भी बनाया जाता है। कुमाऊंनी भाषा में इसको लोहोटु रोटी कहा जाता है। सिसौंण का साग (पौष्टिक सब्जी) सिसौंण के साग में बहुत ज्यादा पौष्टिकता होती है। सिसौंण को आम भाषा में लोग ‘बिच्छू घास’ के नाम से भी जानते हैं। सिसौंण के हरे पत्तों की सब्जी बनाई जाती है। सिसौंड के पत्तों या डंडी को सीधे छूने पर यह दर्द देता है। अगर यह शरीर के किसी हिस्से में लग जाए तो वहां सूजन आ जाती है और बहुत ज्यादा जलन होती है। सब्जी बनाने पर यह सब नहीं होता और गांव-देहात की अनुभवी औरतें इसे बड़ी सावधानी से हाथ में कपड़ा लपेटकर काटती हैं। काप या कापा (हरे पत्तों की पीसकर) यह एक हरी करी है। सरसों, पालक आदि के हरे पत्तों को पीस कर बनाया जाने वाला ‘काप’ कुमाऊंनी खाने का एक अहम अंग है। इसे रोटी और चावल के साथ लंच और डिनर में खाया जाता है। यह एक शानदार और पोषक अहार है. ‘काप’ बनाने के लिए हरे साग को काटकर उबाल लिया जाता है। उबालने के बाद साग को पीसकर पकाया जाता है। डुबुक या डुबुके (पहाड़ी दाल) डुबक भी कुमाऊं के पहाड़ों में अक्सर खाई जाने वाली डिश है। असल में यह दाल ही है, लेकिन इसमें दाल को दड़दड़ा पीसकर बनाया जाता है, लेकिन यह ‘मास के चैस’ से अलग है। डुबक पहाड़ी दाल भट और गहत आदि की दाल से बनाया जाता है। लंच के समय चावल के साथ डुबुक का सेवन किया जाता है। झिंगोरा या झुंअर की खीर (एक पहाड़ी अनाज) झिंगोरा या झुंअर एक अनाज है और यह उत्तराखंड के पहाड़ों में उगता है। यह मैदानों में व्रत के दिन खाए जाने वाले व्रत के चावल की तरह ही होता है। झुंअर के चावलों की खीर यहां का एक स्वादिष्ट व्यंजन है। दूध, चीनी और ड्राइ-फ्रूट्स के साथ बनाई गई झिंगोरा की खीर एक आलौकिक स्वाद देती है। बाल मिठाई (पहाड़ी मिठाई) बाल मिठाई कुमाऊं और खासकर अल्मोड़ा की प्रसिद्ध मिठाई है। अब यह मिठाई देशभर में मशहूर हो चुकी है। पहाड़ों से मैदानों की ओर जाने वाले लोग अपने साथ बाल मिठाई ले जाना नहीं भूलते। इसके बाद वे मैदानों के अपने दोस्तों व परिचितों को यह मिठाई खिलाते हैं। एक बार इस मिठाई का स्वाद लेने वाले लोग अगली बार स्वयं ही बाल मिठाई मंगवाते हैं। यह जितनी ज्यादा स्वादिष्ट होती है उतनी ही ज्यादा पौष्टिक भी होती है। इस मिठाई को बनाने में खोया के अलावा सुगर बॉल का भी इस्तेमाल किया जाता है।

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10-Apr-2018

Cultures and Peoples (Overview)

Cultures and Peoples (Overview) Worshippers make the Gods. Uttarakhand, known as the 'Abode of the Gods' with all its pristine appeal,wouldn't be the same without its people who bring out the richness and beauty of the state. The splendour of Uttarakhand is not limited to picture perfect mountains and nourishing rivers. It is the people and the culture of this state that bring its magnificence to life. Uttarakhand is bestowed with a rich and varied culture. The culture is greatly influenced by its geographical factors and landscape. A distinct way of life is observed in the mountains, deep valleys, forests and hillsides of the region. The majority of the cultural heritage of Uttarakhand has been intertwined with lore and customs grounded in chaste religious faith Regional and traditional culture is deeply rooted in religion, music, dance and art that have been brought down the ages. The hills resound with life as the people celebrate the season and legends, and welcome Mother Nature to their land. Based on the local traditions, these events are known not only for their religious significance butalso for their social significance. The agrarian state marks the arrival of each new season with a festival,giving the state many reasons to celebrate. The festivals and fairs play an important role in the community as they commemorate sacred and significant events. The attractive fairs and festivals celebrated with greatspontaneity - draw the attention of visitors from far and wide and are an important platform for socio-cultural and economic exchanges. The state not only opens the doors to one's favourite gods and goddesses but also helps pilgrims to rediscover themselves on their spiritual journeys. Since time immemorial, the Ganga has been considered the holiest river in the country and is revered as jeevan dayini or the giver of life. Devotees look forward to enchanting religious rituals and the divine Ganga aarti that takes place in the evenings by the banks of the River Ganga at Haridwar and Rishikesh. The ritual bath or the Kumbh Mela witness the largest gathering of devotees on the banks of the Ganga once every 12 years. Other sacred pilgrimages include Yatras to Nanda Devi and Kailash Mansarovar. This route offers awe-inspiring scenes along the journey. The Hemkund Sahib and Nanakmatta are holy places for the Sikhs and Piran Kaliyar is for Muslims seeking spiritual fulfilment. Today the state is a melting pot of many communities The tribes of the state represent the original inhabitants of this land. Major tribes include the Bhotias (Shaukas), Tharus, Buxas, Jaunsaris and Rajis. Each tribe follows its own distinct pattern and way of life, making the state a prosperous basket of culture. Today they flourish in their own small but beautiful ways. The rich socio-cultural activities are celebrated with great energy by the people and are great tourist attractions, as well as learning hot spots. Fairs are an inseparable part of the social and cultural life and encourage the strengthening of social ties across castes religions and all sections of society. Traditional art formsare revived at such fairs and get the recognition and support they need to continue down the ages. Uttarakhand is a land of lore and legends, and of holy rivers. The sacred shrines, temples and rivers arewoven with a series of legends and folk tales that reflect the cultural diversity of the place. Uttarakhand is also known as The Land of Festivities' owing to the numerous fairs and festivals that take place here, like the Nanda Devi Mela, Holi Mahotsav and Dussehra. The four most holy pilgrimage sites, Yamunotri, Gangotri, Kedarnath and Badrinath, referred to as Char Dham, lie here and have been sanctified by holy saints and pilgrims since ancient times. Pilgrims come on a spiritual journey, making this place and an important pilgrimage destination visited by thousands of people in search of the divine.

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03-May-2018

Basanti Folk Songs

Basanti folk songs are love songs sung as the Basant or spring season approaches. Mangal folk songs are sung during marriage ceremonies and the Baujband folk songs are sung by shepherds in the form of a conversation between a man and a woman. The other folk songs include Chhopati, which is a love song sung in the form of questions and answers by men and women who dance in a circle. This is most prevalent in Khai-Jaunsar. The Chounphula and Jhumeila songs form a part of the seasonal dances performed from Sankranti to Basant Panchami or Baisakhi. Khuded songs are sung, portraying the suffering of a woman parting from her husband. Chura songs are popular tunes sung by old experienced shepherds with a view to teach the young shepherd the tricks of his profession.

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05-May-2018

Tribes Uttarakhand

Tribals The original natives of the land of Uttarakhand belong to different communities or tribes that have their own distinct and rich culture. The main tribes of the land are the Bhotias (Shaukas), Tharus, Buxas, Jaunsaris and Rajis. Bhotia, which is a term derived from the Sanskrit word ‘Bhot’, is a generic name that includes the Shaukas of Munsiyari (Pithoragarh), Rangs of Dharchula (Pithoragarh), Tolchas and Marchhas of Niti and Mana valleys (Chamoli). These groups are mainly engaged in pastoral activities and are also known as Shaukas. The Tharus were once the largest scheduled tribes and are now settled in the Khatima and Sitarganj tehsils of Udham Singh Nagar districts. Some say that their descendants are the Rajputs, while some others trace their origin from the Mongols of Central Asia. Their language is heavily influenced by Hindi and Nepali. Marriage by exchange or ‘badla marriage’, where two men marry each other’s sisters was traditionally practiced here. The joint family system is very inherent here. The Biradari Panchayat is the political organization of the Tharus. The Tharus also believe in 36 deities, as well as in witchcraft, sorcery and sacrifices. They are an agricultural community who are also fishing experts. Women do not eat the fish touched by men and so the men and women fish separately. The Buxasare said to be the original inhabitants of the Terai belt and live in Udham Singh Nagar, Dehradun and Pauri Garhwal. They are the followers of Lord Rama and Krishna.

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05-May-2018

Mangal Geet

Mangal Geet The prominent folk songs are Mangal Geet, which issung at any pleasant occasion, Awahan Geet is sung to invite God on any occasion and Vivah Geet is sung at the time of marriage. Pavade is an epic folk song of the Garhwal region related to the local heroes of the region and their bravery. Hori Geet folk songs are related to the festival of Hulland Guda are the songs related to the philosophy of life. Original folk dances are attached to rituals and are also a means of entertainment. They can be broadly classified into occupational, seasonal, martial, devotional and ritualistic dances. The prominent folk dances are theBhotia Dance, Chamfuli and Chholia. The BhotiaThe dance forms are greatly influenced by mythology, religion and social events Dance, Dandala, Chamfuli, Dhusaka and Dhurang are the group folk dances of theBhotias and are quite similar to the Garba dance of Gujarat.

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10-May-2018

Jhoda or Jhanjhari

The Pandava dance performed during Dussehra and Deepawali is enacted by narrating the story of the Mahabharata along with dance and music. The Badra Nati dance is performed by men and women wearing colourful costumes, during religious festivals and on other social occasions. On the occasion of the bride’s first visit to her parent’s home after marriage, the Tharu dance is performed to welcome the newly-married couple. The Khuder dance is performed by women when they remember their parents’ home. The Chanchari dance is a dance related to the Garhwal and Almora region. The Jhoda or Jhanjhari dance of Kumaon is staged spectacularly on a full moon night by young men and women. Mukhota Dance

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10-May-2018

Chamfuli Dance

The dance forms are greatly influenced by mythology, religion and social events. Chamfuli is a popular dance form of the Garhwal region. in this dance, men and Women dance to the rhythm separately and together in pairs with impressive facial expressions. The Chholia dance is performed exclusively by the boys at a marriage procession. A few of them dress up as soldiers and enact the scenes of fierce duels. After this dance, the bride is carried away by her lover. This dance is a war dance and has existed for more than 2000 years. Young Dance in Garwal Region

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10-May-2018

Pahari Art

The Pahari Kalam style of painting was developed in the Kumaon area and was practiced in some of the Himalayan regions. in the 17th century, the Mughal Prince Suieman Shikand took refuge in Garhwal. He was accompanied by a few artists well versed in the Mughal style of miniature paintings. They were instrumental in introducing the style now known as the Garhwal School of Painting. Wood Carving Pahari art also extends to cloth and wall paintings. Walls were plastered with a mix of mud and cow dung. Thechatu-pattern is followed on the walls with red painted as the background and then replaced by the Laxmi Narayan pattern, which consists of two taciturn human figures inside a framework of dots. The chatupattern is a design structure that has stylistic similarities to the Buddhists' structures. Aipan or Alpana is a popular Kumaoni art form done on walls, paper and pieces of cloth. This decorative art includes drawings of various geometric and other figures representing gods, goddesses and objects of nature. Thepichhauras or dupattas are also decorated in this way. These ritual designs and patterns are an expression of a women’s artistic taste. Aipan Painting

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06-Nov-2018

Uttarakhand Region A Buzz With Diwali Celebrations

उत्तराखंड क्षेत्र में पहाड़ियों ने दीवाली समारोहों से अचंभित किया, उत्तराखंड की पहाड़ियों दिवाली-बागवाल के अपने स्वयं के संस्करण के लिए गतिविधि से अजीब हैं। पंजाब में बासाखी के समान, बागवाल एक प्रकार का फसल उत्सव है। पूरे साल कूड़े हुए, ग्रामीण अंततः एक ब्रेक ले सकते हैं और अपने श्रम के फल का आनंद ले सकते हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल, विशेष रूप से जौनपुर और जौनसर भावर क्षेत्रों के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता है, पारंपरिक गायन और नृत्य करने से चार दिवसीय त्योहार होता है जिसका नाम हर दिन - आस्क्य, पाकोरिया, बाराज और भण्ड का नाम है। Mussooriehandbook.com के संजय तामता और एक वृत्तचित्र फिल्म निर्माता, जिन्होंने आकर्षक दिवाली पर एक वृत्तचित्र फिल्म बनाई, ने कहा, "इसकी समृद्ध परंपरा जिसे संरक्षित करने की जरूरत है। वास्तव में, यह एक शानदार पर्यटक आकर्षण हो सकता है। "असामान्य दिवाली के लिए तैयारी एक महीने पहले शुरू हुई थी, जब मैदानों में दिवाली मनाई जा रही थी। तब यह है कि महिला लोक पारंपरिक उखलु / ओखल में चिवाडा (पीटा चावल) को मारने में व्यस्त हो जाते हैं - एक पत्थर पर पाउंड अनाज के लिए एक छेद बनाया जाता है। चिवाडा, जो कि नए धान से बना है और इसमें एक विशिष्ट स्वाद है, बाद में मेहमानों और लड़कियों के बीच वितरित किया जाता है जो अपने मातृभूमि में जाते हैं। एक और विशिष्ट परंपरा भेलू की तैयारी कर रही है - पेड़, छाल या शाखाओं की गद्दी एक हरे रंग की नस से कसकर बंधी हुई है। इन भैलुओं का आकार और वजन अलग-अलग आयु वर्गों के लिए अलग-अलग होता है। अगर बच्चों के छोटे होते हैं, तो पुरुषों के साथ वजन 1 किलो वजन होता है और एक घंटे तक चल सकता है। महिलाएं और बुजुर्ग छोटे होते हैं। तब ग्रामीण लोग एक मैदान में इकट्ठे होते हैं और अपने भेलुओं को उजागर करते हैं। ये तब दोनों सिरों से जलाए जाते हैं और उत्साहपूर्वक बहते हैं। भेलुओं की घुमाव एक अलग आवाज बनाता है। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, जब वह 70 वर्षीय शशि भूषण जोशी, एक युवा लड़के के रूप में भेलुओं को जलाते थे, उन्होंने कहा, "घटना में भाग लेने वाले सभी ग्रामीणों को देखने का यह एक अद्भुत अनुभव है। पाइन के पेड़ से लकड़ी की सुगंध और मीठे पुरी के स्वाद अभी भी मेरे दिमाग में ताजा है।

Dehradoon